विकास के दावों की पोल, जमीनी हकीकत आई सामने” पेय जल की व्यवस्था चरमराई
1 min readबेलगांव के अंश पापर पुरवा और बेलगांव की बदहाली ने खोली विकास के दावों की पोल, जमीनी हकीकत आई सामने”
बांदा


बांदा सदर विधानसभा 235 के ग्राम पंचायत बेलगांव के अंश पापर पुरवा और बेलग्राम की जमीनी स्थिति देखकर यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर विकास के नाम पर इतने बड़े-बड़े दावे किस आधार पर किए जा रहे हैं। क्षेत्र में पहुंचकर जो हालात देखने को मिले, वे सरकारी दावों और वास्तविकता के बीच का अंतर साफ दिखाई देते हैं। गांवों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, लेकिन मंचों, पोस्टरों और सोशल मीडिया पर विकास की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की जाती है मानो हर समस्या का समाधान हो चुका हो। समझ में नहीं आता कि आखिर विधायक और उनके समर्थक जनता से झूठ बोलकर क्या हासिल करना चाहते हैं। जितना काम हुआ है, उतना ही बताइए, जनता के टैक्स के पैसे से जो कार्य हुए हैं उनका सही हिसाब दीजिए, लेकिन झूठे प्रचार और बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों से जनता को गुमराह मत कीजिए। एक सड़क का शिलान्यास या उद्घाटन होगा तो लाखों रुपये के टेंट, मंच, माइक और भीड़ जुटाने पर खर्च दिखाई देगा, लेकिन अगर गांव की गलियों, नलों, स्कूलों और सड़कों का वास्तविक सर्वे कर लिया जाए तो सच्चाई खुद सामने आ जाएगी। अंश पापर पुरवा और बिलग्राम में लोगों को पानी, सड़क, सफाई, रोशनी और अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए आज भी संघर्ष करना पड़ रहा है। हर घर जल योजना के दावों के बावजूद कई स्थानों पर नल शोपीस बने हुए हैं। ग्रामीणों को पेयजल के लिए भटकना पड़ रहा है। सड़कें बदहाल हैं, बरसात में आवागमन प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है और कई स्थानों पर विकास कार्य अधूरे दिखाई देते हैं। भोली-भाली जनता को केवल प्रचार के सहारे भ्रमित करना लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नहीं है। जनता अब भाषण नहीं, काम का परिणाम देखना चाहती है। विकास केवल पोस्टरों, बैनरों और फेसबुक की फर्जी आईडी पर होने वाले प्रचार से साबित नहीं होता, बल्कि गांव की गलियों, स्कूलों, अस्पतालों, पेयजल व्यवस्था और जनता के जीवन स्तर से दिखाई देता है। जनता को गुमराह करके हासिल की गई कुर्सी स्थायी नहीं होती, क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है। जब जनता सवाल पूछना शुरू कर देती है तो फिर प्रचार नहीं, जमीनी सच्चाई बोलती है। अंश पापर पुरवा और बेलगांव की स्थिति देखकर यही महसूस होता है कि विकास के दावों की वास्तविक जांच गांव-गांव जाकर ही संभव है, और जनता अब यही चाहती है कि प्रचार नहीं, बल्कि धरातल पर हुए काम का सही मूल्यांकन हो।
