जवानियां बना भरत नगर लगेगी भरत तिवारी की आदमकद प्रतिमा,
1 min readबिहार
जवानियां गांव को गंगा निगल निगलने के बाद बसाया गया था उसी गांव के 70 परिवारों की मूलभूत सुविधाओं के लिए भरत तिवारी लड़ रहा था…
गंगा कटाव से उजड़े जवईनिया गांव के विस्थापितों ने अपनी नई बस्ती का नाम भरत नगर रख दिया है.
भोजपुर के बिलौटी गांव में बने इस नए आशियाने को ग्रामीण भरत भूषण तिवारी के संघर्ष की पहचान मानते हैं।
गांव के प्रवेश द्वार पर एक बड़ा बोर्ड लगाया गया है, जिस पर लिखा है “आपका बलिदान सदैव स्मरणीय रहेगा. शहीद भरत भूषण तिवारी”.
भरत नगर नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि उन सैकड़ों विस्थापित परिवारों की भावनाओं का सार्वजनिक ऐलान है,
जो मानते हैं कि भरत तिवारी ने उनकी लड़ाई लड़ते हुए अपनी जान गंवाई.
ग्रामीणों का कहना है कि भरत तिवारी का व्यक्तिगत स्वार्थ कुछ भी नहीं था.
वे अपने लिए नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए प्रशासन से लड़ रहे थे, जिनके घर गंगा की धारा में समा गए थे और जिनके सामने दो वक्त की रोटी से लेकर रहने तक का संकट था.
बिलौटी गांव के समीप बसाये जा रहे करीब 70 कटाव पीड़ित परिवारों को गड्ढे में जमीन देने का विरोध कर रहा था.
उसकी मांग थी कि कटाव पीड़ितों को जिस गड्ढे में जमीन दी गयी है, उस गड्ढे में आठ-दस फुट मिट्टी भरी जाये.
ताकि, कटाव पीड़ित उस जमीन पर मकान बना सकें और अच्छे से जीवन बसर कर सकें.
लेकिन, दुर्भाग्य देखिए कि उसी गड्ढे के पास वह पुलिस के साथ झड़प और फायरिंग में मारा गया.
भरत भूषण तिवारी लगातार जिला प्रशासन से मिलते थे. वे अधिकारियों के सामने बिजली, पेयजल, सड़क, मिट्टी भराई और स्थायी पुनर्वास की मांग उठाते थे.
स्थानीय लोगों के अनुसार, उनकी पहल के बाद गांव में बिजली व्यवस्था बेहतर हुई और पेयजल की समस्या में भी सुधार आया.
भरत तिवारी लोगों से कहते थे कि वे अपने पैसे से मिट्टी भराई न कराएं क्योंकि यह सरकार की जिम्मेदारी है.
वे प्रशासन से इस काम को कराने की कोशिश कर रहे थे.
ग्रामीणों का कहना है कि वे हर रोज गांव आते थे और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का हालचाल पूछते थे.
यदि चापाकल खराब होता तो संबंधित विभाग से संपर्क करते. किसी के घर बिजली नहीं होती तो अधिकारियों से बात करते.
ग्रामीण सरोज तिवारी का कहना है कि गांव का नाम बदलना केवल शुरुआत है. “भरत तिवारी का सपना अधूरा नहीं रहने दिया जाएगा.
अब यहां मिट्टी भराई कराई जाएगी. इसके बाद उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित की जाएगी.”
वे कहते हैं कि यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे समाज का है. इसमें हर जाति और हर धर्म के लोग शामिल हैं.
उनका कहना है कि कुछ लोग आलोचना भी कर रहे हैं,
लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सही काम का विरोध हमेशा होता है.
जवईनिया गांव अब भौगोलिक रूप से भले ही गंगा में समा चुका हो, लेकिन उसकी पहचान एक नए नाम के साथ फिर जीवित हुई है.
‘भरत नगर’ का बोर्ड केवल एक साइनबोर्ड नहीं, बल्कि उन विस्थापित परिवारों की सामूहिक स्मृति है जिन्होंने अपना घर खोया,
अपने खेत खोए और अब अपने संघर्ष को एक नाम दिया है.
भरत तिवारी के जिंदगी की कहानी रोंगटे खड़ी कर देती है शरीर में सिहरन पैदा कर देती है..
क्या जीवन था निष्काम भाव से दूसरे की सेवा में अदभुत समर्पण जो इस युग में असंभव लगता है।
भरत की जब मौत आई तो वह भी बड़े शान से अपने आखिरी सफर पर निकलते हुए
विकट निद्रा में सोए हुए लोगों को जगा दिया…
जाते जाते हाथ हिलाते हुए मानो भरत तिवारी कह रहे हों..
हमें तो सिर्फ़ जगाना है सोने वालों को..
जो दर खुला है वहाँ हम सदा नहीं देंगे..

