May 31, 2026

Awadh Speed News

Just another wordpress site

तीस साल से न्याय की चौखट का चक्कर लगा रही विधवा महिला राजस्व विभाग पर उठ रहा सवाल

1 min read
Spread the love

तीस साल से न्याय की चौखट पर विधवा की दस्तक, एक बीघा जमीन निगली व्यवस्था या दबंगई

पति की मौत के बाद जमीन से बेदखली का आरोप, तहसील के चक्कर काटते बीत गई उम्र; अब प्रशासन के सामने इंसाफ की अग्निपरीक्षा

बारा, प्रयागराज।

लालापुर थाना क्षेत्र के ओढ़गी तरहार गांव की रहने वाली विधवा भुल्लन देवी की दर्दनाक दास्तान राजस्व व्यवस्था की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है। एक बीघा जमीन के लिए शुरू हुई लड़ाई अब तीन दशक का लंबा संघर्ष बन चुकी है। पति की मौत के बाद जिस भूमि पर उनका वैधानिक अधिकार होना चाहिए था, आज उसी जमीन की तलाश में वह सरकारी दफ्तरों की चौखट पर ठोकरें खाने को मजबूर हैं। पीड़िता के अनुसार उनके पति स्वर्गीय तीर्थराज पाल ने वर्षों पहले गिधार मौजा की आराजी संख्या -छब्बीस में एक बीघा भूमि विधिवत खरीदकर खेती शुरू की थी। परिवार की आजीविका का यही मुख्य आधार था। लेकिन पति के निधन के बाद हालात ऐसे बदले कि जमीन पर उनका अधिकार ही सवालों के घेरे में आ गया। आरोप है कि सह-खातेदारों ने उन्हें उनके हिस्से की भूमि से बेदखल कर दिया और तभी से न्याय की लड़ाई शुरू हो गई। वर्षों तक तहसील, लेखपाल, कानूनगो और राजस्व अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर लगाने के बावजूद समाधान नहीं निकल सका। न्याय की उम्मीद में शुरू हुआ संघर्ष अब बुजुर्ग हो चुकी महिला की जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द बन गया है। हालत यह है कि जिस जमीन पर उनका दावा है, उसका स्पष्ट निर्धारण तक नहीं हो पाया। हाल ही में राजस्व निरीक्षक विजयकांत पाण्डेय के निर्देश पर पैमाइश कराई गई। पीड़िता को उम्मीद थी कि तीन दशक पुराने विवाद का पटाक्षेप होगा, लेकिन पैमाइश के बाद भी स्थिति साफ नहीं हो सकी। राजस्व विभाग का तर्क है कि नक्शा छोटा होने के कारण भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं हो रही है और मामले का निस्तारण राजस्व संहिता की धारा-तीस के तहत ही संभव है। इधर भुल्लन देवी की पीड़ा अब व्यवस्था के खिलाफ एक सवाल बनकर खड़ी हो गई है। उनकी आंखों में आंसू और आवाज में दर्द साफ झलकता है। उनका कहना है, “तीस साल पहले मेरी जमीन थी, आज उसमें से एक इंच भी मेरे पास नहीं है। न्याय की आस में जिंदगी बीत गई, अब फैसला ऊपर वाला ही करेगा।” सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर एक विधवा को अपनी ही जमीन के लिए तीस वर्षों तक भटकना क्यों पड़ रहा है? यदि जमीन खरीदी गई थी तो उसका अधिकार अब तक सुनिश्चित क्यों नहीं हो सका? यदि विवाद है तो उसका निस्तारण दशकों बाद भी अधूरा क्यों है? ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब प्रशासनिक फाइलों में कहीं खोया नजर आ रहा है। अब निगाहें जिलाधिकारी प्रयागराज और उपजिलाधिकारी बारा गणेश कनौजिया पर टिक गई हैं। क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार में एक पीड़ित विधवा को उसका हक मिल पाएगा? क्या राजस्व विभाग इस बहुचर्चित प्रकरण का निष्पक्ष और समयबद्ध समाधान करेगा? या फिर भुल्लन देवी की फाइल भी उन हजारों मामलों की तरह धूल फांकती रहेगी, जिनमें फरियादी बूढ़े हो जाते हैं लेकिन न्याय नहीं मिलता। तीस वर्षों से चल रही यह लड़ाई अब केवल एक बीघा जमीन का विवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता, जवाबदेही और न्याय व्यवस्था की साख का भी बड़ा इम्तिहान बन चुकी है। प्रशासन से मांग: मामले की निष्पक्ष जांच कर पीड़ित विधवा को शीघ्र न्याय दिलाया जाए। जनता की नजर इस प्रकरण पर बनी हुई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *