भगवान परशुराम सदन में मुरलीधर जी महाराज की राम कथा, चित्रकूट प्रसंग और श्रवण कथा ने श्रोताओं को किया भावविभोर
1 min readधौलपुर राजस्थान।
धौलपुर मचकुंड रोड भगवान परशुराम सदन में मुरलीधर जी महाराज की राम कथा
चित्रकूट प्रसंग और श्रवण कथा ने श्रोताओं को किया भावविभोर
धौलपुर, शहर में चल रही प्रसिद्ध कथावाचक संत मुरलीधर महाराज की नौ दिवसीय संगीतमय राम कथा के आठवें दिन भक्ति का सागर उमड़ पड़ा। कथा पंडाल में हजारों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालु श्री राम के वनवास प्रसंग और राजा दशरथ की मार्मिक व्यथा को सुनकर भावविभोर हो गए। महाराज जी ने अपनी ओजस्वी वाणी में भगवान श्री राम के वनवास से चित्रकूट पहुंचने और राजा दशरथ द्वारा रानी कौशल्या को सुनाए श्रवण कुमार के प्रसंग का अत्यंत हृदयस्पर्शी वर्णन किया।
श्री राम का चित्रकूट प्रसंग: त्याग और मर्यादा का सर्वोच्च उदाहरण
कथा व्यास मुरलीधर महाराज ने श्री राम के वनवास गमन का वृतांत सुनाते हुए कहा कि पिता के वचन को निभाने के लिए भगवान राम ने राजपाठ का त्याग कर चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया। उन्होंने अयोध्या से निकलकर तमसा नदी, श्रृंगवेरपुर और फिर प्रयागराज पहुंचने के प्रसंगों का सजीव चित्रण किया। महाराज जी ने केवट प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान राम ने केवट को न केवल अपनी सेवा का अवसर दिया, बल्कि उसे भवसागर से पार लगाने का वचन भी दिया।
उन्होंने आगे बताया कि प्रयागराज में ऋषि भरद्वाज से आज्ञा लेकर भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ चित्रकूट की ओर प्रस्थान कर गए। महाराज जी ने चित्रकूट के महात्म्य पर प्रकाश डालते हुए कहा, “चित्रकूट वह पावन भूमि है जहां प्रकृति और प्रभु का अद्भुत संगम है। यहां मंदाकिनी के तट पर श्री राम ने अपनी पर्णकुटी बनाई और वनवासियों के साथ प्रेमपूर्ण जीवन व्यतीत किया।” उन्होंने समझाया कि चित्रकूट का अर्थ है ‘जहां चित्त का कूट हो,’ अर्थात जहां मन की सभी वृत्तियां शांत होकर प्रभु में रम जाएं। भगवान राम ने यहां रहकर संतों और ऋषियों को आसुरी शक्तियों से मुक्ति दिलाई और धर्म की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
राजा दशरथ की व्यथा और श्रवण कुमार की कथा
इसके उपरांत, मुरलीधर महाराज ने अयोध्या में राम के विरह में व्याकुल राजा दशरथ की पीड़ा का वर्णन कर पूरे पंडाल को शोकाकुल कर दिया। उन्होंने उस रात्रि का वृतांत सुनाया जब राजा दशरथ ने रानी कौशल्या को अपने अतीत में हुए एक अनजान पाप की कथा सुनाई थी।
महाराज जी ने बताया कि किस प्रकार युवावस्था में राजा दशरथ शब्दभेदी बाण चलाने में निपुण थे। एक दिन सरयू नदी के तट पर जब उन्होंने जल भरने की ध्वनि सुनी तो किसी वन्य पशु के भ्रम में शब्दभेदी बाण चला दिया। यह बाण श्रवण कुमार को जा लगा, जो अपने नेत्रहीन माता-पिता के लिए जल लेने आए थे।
अंतिम सांसें गिनते हुए श्रवण कुमार ने राजा दशरथ से अपने प्यासे माता-पिता को जल पिलाने की विनती की। जब राजा दशरथ जल लेकर उनके माता-पिता के पास पहुंचे और पूरी घटना बताई, तो पुत्र वियोग में तड़पते हुए माता-पिता ने दशरथ को श्राप दिया, “जिस प्रकार हम पुत्र वियोग में प्राण त्याग रहे हैं, उसी प्रकार तुम भी पुत्र वियोग में ही अपने प्राण त्यागोगे।” इस प्रसंग को सुनाते हुए महाराज जी की वाणी भी गंभीर हो गई और उपस्थित श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। उन्होंने कहा कि कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है, चाहे वह जाने में किया गया हो या अनजाने में।
कथा के अंत में महाराज जी ने संदेश दिया कि श्री राम का जीवन त्याग, मर्यादा और धर्म का प्रतीक है, वहीं दशरथ की कथा यह सिखाती है कि हमें हर कर्म को बहुत सावधानी से करना चाहिए। कथा के दौरान बीच-बीच में प्रस्तुत संगीतमय भजनों ने श्रद्धालुओं को भक्तिरस में सराबोर कर दिया।
संगीत मय राम कथा के अवसर पर राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने परशुराम सदन पहुंचकर श्री राम कथा सुनी और महाराज श्री से आशीर्वाद लिया और व्यास पीठ की पूजा आरती की और पूर्व मुख्यमंत्री ने भी राम कथा के बारे में व्यास पीठ से कहा कि संत मुरलीधर महाराज राम कथा की गंगा में सभी श्रोताओं को डुबकी लगवाते है और स्वयं भी लगाते हैं। वसुंधरा राजे ने श्री राम भक्त सेवा समिति के संरक्षक श्री भगवान मित्तल सराफ एवं उनके सभी सहयोगियों को धौलपुर में श्री राम कथा करवाने के लिए धन्यवाद दिया।
ब्यूरो विजय शर्मा

