विश्वामित्र ने यज्ञ की रक्षा के लिए मांगे राम, अहिल्या को भगवान श्री राम ने किया श्राप मुक्त :-संत मुरलीधर महाराज
1 min readधौलपुर राजस्थान ।
विश्वामित्र ने यज्ञ की रक्षा के लिए मांगे राम और लक्ष्मण अहिल्या को श्री राम ने किया श्राप मुक्त संत मुरलीधर महाराज।
धौलपुर मचकुंड रोड भगवान परशुराम धर्मशाला में आयोजित संगीतमय श्री राम कथा के चौथे दिन संत मुरलीधर महाराज ने बताया कि ऋषि विश्वामित्र ने अपने यज्ञ की रक्षा के लिए अयोध्या के राजा दशरथ से उनके पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण को अपने साथ ले जाने का निवेदन किया। यज्ञ में बाधा डालने वाले राक्षसों से त्रस्त होकर, विश्वामित्र अयोध्या पहुंचे और राजा दशरथ के दरबार में उनका भव्य स्वागत किया गया। राजा दशरथ ने विश्वामित्र से पूछा कि वह किस कारण से पधारे हैं। विश्वामित्र ने दशरथ को बताया कि राक्षस उनके यज्ञ को विध्वंस कर रहे हैं, और इसी से रक्षा के लिए वह श्रीराम और लक्ष्मण को चाहते हैं।

दशरथ ने पहले तो अपने पुत्रों को भेजने से इनकार कर दिया और इसके बदले में कोई और सेवा या संपत्ति देने की पेशकश की। लेकिन गुरु वशिष्ठ ने समझाया कि राम और लक्ष्मण कोई साधारण बालक नहीं हैं, उनके शौर्य और पराक्रम की चर्चा पुराणों में भी है। गुरु वशिष्ठ की बात मानकर दशरथ ने राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के हवाले कर दिया और कहा, “आज से आप ही इनके माता-पिता हैं।”
विश्वामित्र ने जब राम और लक्ष्मण को अपने आश्रम के निकट ताड़का नामक राक्षसी से मिलवाया, तो ताड़का क्रोधित होकर उन पर हमला करने दौड़ी। राम ने उसे तुरंत मार गिराया। इसके बाद राम और लक्ष्मण ने यज्ञ की सुरक्षा का वचन दिया। तभी मारीच अपनी सेना लेकर उन पर हमला करने आया, लेकिन राम ने उसे समुद्र के पार फेंक दिया, जिससे देवताओं ने श्रीराम की जय-जयकार की।
आगे चलते हुए, विश्वामित्र ने राम को एक पत्थर की शिला दिखाई और बताया कि यह गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या हैं, जिन्हें इंद्र के अपराध के कारण श्राप मिला था। राम ने अपने चरण स्पर्श से अहिल्या को श्राप से मुक्त किया, और अहिल्या उनके चरणों में गिर पड़ी। राम ने उन्हें मुक्ति प्रदान कर स्वर्ग भेज दिया।
राम और लक्ष्मण के साथ चलते हुए विश्वामित्र जनकपुर के निकट पहुंचे। वहाँ राजा जनक ने दोनों भाइयों को देखा और उनसे प्रभावित हुए। विश्वामित्र ने जनक को बताया कि ये रघुकुलमणि राजा दशरथ के पुत्र हैं, जिन्होंने यज्ञ की रक्षा कर असुरों को पराजित किया है। राजा जनक ने उन्हें अपने महल में ठहराया और सम्मानपूर्वक उनकी सेवा की।
संत मुरलीधर महाराज ने कहा कि भगवान भक्ति के महल में ठहरते हैं, ना कि अहंकार के महल में महाराज जी ने कहा कि भक्त को अपने को कभी अकेला नहीं मानना चाहिए क्योंकि जो भगवान का भजन करता है व उसकी शरण में रहता है तो भगवान उसके साथ होते हैं। पूज्य महाराज जी ने कहा राम कथा मानस का प्रसाद है इसे खूब ग्रहण करना चाहिए और भगवान राम जी से प्रेम करना चाहिए क्योंकि भगवान प्रेम के ही भूखे होते हैं। और प्रेम से ही भगवान मिलते हैं जगत में केवल भगवान ही आपके हैं, जगत आपका नहीं है भगवान भक्त से कभी दूर नहीं होते हैं। भगवान प्रेम के बस में होते हैं। श्री राम कथा में संत मुरलीधर महाराज ने सुंदर-सुंदर भजन गाए उन भजनों पर पंडाल में बैठे लोगों ने खूब ठुमके लगाए। कथा के बाद महाराज श्री ने मुख्य यजमान राकेश कांटे व उनकी पत्नी बेबी, मनोज कुमार गोयल अंजना गोयल, रमेश चंद गोयल उमा देवी, सतीश प्रीति गोयल, श्री भगवान मित्तल सराफ, विद्या देवी, द्वारा श्री राम कथा व्यास पीठ आरती करवाई।
श्री राम कथा के संयोजक श्री भगवान मित्तल सराफ ने प्रसाद का वितरण करवाया।
प्रसाद का वितरण करवाया।
ब्यूरो विजय शर्मा
