सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप, पेट्रोल पंप, राइस मिल और गोदाम तक—सात गाटा नंबरों ने खोले बड़े सवाल
1 min readसरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप: पेट्रोल पंप, राइस मिल और गोदाम तक—सात गाटा नंबरों ने खोले बड़े सवाल
बंजर से लेकर कब्रिस्तान, अतिथि गृह, नागरिक उड्डयन और भूदान की जमीन तक पर कब्जे का आरोप; SDM सदर के दरबार में पहुंची शिकायत—अब राजस्व अभिलेख बताएंगे जमीन की असली कहानी

सुल्तानपुर।
सरकारी और सार्वजनिक उपयोग की जमीनों पर कथित कब्जे को लेकर सुल्तानपुर में एक शिकायत ने प्रशासनिक तंत्र के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। शिकायतकर्ता अंकुर कुमार ने उप जिलाधिकारी सदर को प्रार्थना पत्र देकर सात अलग-अलग गाटा नंबरों की राजस्व अभिलेखों के साथ मौके पर जांच कराने की मांग की है।
शिकायत में आरोप गंभीर हैं। कहीं बंजर भूमि पर पेट्रोल पंप प्रस्तावित किए जाने की बात कही गई है, तो कहीं राज्य अतिथि गृह की जमीन पर कथित कब्जे का आरोप है। एक जमीन को कब्रिस्तान की भूमि बताया गया है, जबकि दूसरी को नागरिक उड्डयन विभाग की भूमि बताते हुए वहां राइस मिल संचालित किए जाने का आरोप लगाया गया है।
यही नहीं, शिकायत में भूदान समिति की जमीन पर राइस मिल और खाद्यान्न गोदाम तथा बंजर भूमि पर धर्मकांटा लगाए जाने के आरोप भी लगाए गए हैं।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र प्रशासनिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन शिकायत में जिन गाटा संख्याओं और भूमि की प्रकृति का उल्लेख किया गया है, वह प्रशासन से तत्काल राजस्व जांच की मांग जरूर करता है।
सात गाटा नंबर, सात सवाल—क्या है जमीन की असली स्थिति?
शिकायत में निम्न जमीनों को लेकर सवाल उठाए गए हैं—
गाटा संख्या 302, ग्राम छरौली — शिकायतकर्ता ने इसे बंजर भूमि बताते हुए यहां पेट्रोल पंप प्रस्तावित किए जाने का आरोप लगाया है।
गाटा संख्या 551, ग्राम अमहट — इसे राज्य अतिथि गृह की भूमि बताते हुए कथित कब्जे का आरोप लगाया गया है।
गाटा संख्या 115, ग्राम बनकेपुर — शिकायत में इसे कब्रिस्तान की भूमि बताया गया है और आरोप है कि वहां मकान बनाकर निवास किया जा रहा है।
गाटा संख्या 546, ग्राम अमहट — शिकायतकर्ता के अनुसार यह नागरिक उड्डयन विभाग की भूमि है और यहां राइस मिल बनाए जाने का आरोप है।
गाटा संख्या 548, ग्राम अमहट — इसे भूदान समिति की भूमि बताते हुए यहां भी राइस मिल संचालित होने का आरोप लगाया गया है।
गाटा संख्या 543/1008, ग्राम अमहट — इसे बंजर भूमि बताते हुए धर्मकांटा लगाए जाने का आरोप है।
गाटा संख्या 1395, ग्राम गौराबारिक — शिकायत में इसे भूदान समिति की भूमि बताते हुए कथित कब्जे के बाद खाद्यान्न गोदाम बनाए जाने का आरोप लगाया गया है।
आरोप सही निकले तो सवाल सिर्फ कब्जे का नहीं होगा
मामला केवल जमीन पर निर्माण होने तक सीमित नहीं रहेगा।
यदि राजस्व अभिलेख और मौके की जांच में यह साबित होता है कि सरकारी अथवा सार्वजनिक उपयोग के लिए दर्ज जमीन पर वास्तव में कब्जा कर व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं, तो फिर कई दूसरे सवाल भी खड़े होंगे।
निर्माण की अनुमति किसने दी?
भूमि का उपयोग बदलने की अनुमति मिली या नहीं?
यदि जमीन सरकारी है तो निर्माण कैसे हुआ?
संबंधित विभागों को इसकी जानकारी कब हुई?
इतने समय तक राजस्व और स्थानीय प्रशासन की निगरानी कहां थी?
और सबसे महत्वपूर्ण—
अगर सरकारी जमीन पर व्यावसायिक गतिविधि चल रही है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
पेट्रोल पंप से राइस मिल तक—जांच सिर्फ कागजों में न सिमटे
शिकायत में पेट्रोल पंप, राइस मिल, धर्मकांटा और खाद्यान्न गोदाम जैसी व्यावसायिक गतिविधियों का उल्लेख है।
ऐसे में महज खतौनी देखकर जांच पूरी करना पर्याप्त नहीं होगा।
प्रशासन को जरूरत पड़ने पर राजस्व अभिलेख, खतौनी, नक्शा, भूमि की श्रेणी, सीमांकन और मौके की वर्तमान स्थिति का मिलान कराना चाहिए।
जरूरत हो तो संबंधित विभागों के रिकॉर्ड भी देखे जाने चाहिए।
क्योंकि असली सवाल यह है कि कागज में जमीन क्या है और जमीन पर वास्तव में क्या बना हुआ है?
प्रशासन के सामने सबसे बड़ी परीक्षा
शिकायत अब SDM सदर के सामने पहुंच चुकी है।
अब प्रशासन के सामने दो रास्ते हैं—शिकायत को सामान्य प्रार्थना पत्र मानकर फाइल में रख दिया जाए या फिर इसे गंभीरता से लेते हुए स्थलीय जांच और अभिलेखीय सत्यापन कराया जाए।
यदि आरोप निराधार हैं तो जांच से तस्वीर साफ हो जाएगी।
लेकिन यदि सरकारी या सार्वजनिक भूमि पर कब्जे की पुष्टि होती है तो फिर नियमानुसार कब्जामुक्त कराने की कार्रवाई के साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि इतने बड़े निर्माण आखिर किसकी नजरों के सामने हुए।
‘कब्जा’ सिर्फ जमीन पर हुआ या सिस्टम की निगरानी भी गायब रही?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी जमीन पर कथित रूप से कोई छोटा-मोटा अतिक्रमण नहीं, बल्कि शिकायत में पेट्रोल पंप, राइस मिल, धर्मकांटा और गोदाम जैसे बड़े निर्माण/व्यावसायिक उपयोग का उल्लेख है।
यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो प्रशासन को यह भी जांचना चाहिए कि निर्माण के दौरान संबंधित विभागों की अनुमति और निरीक्षण की स्थिति क्या रही।
क्योंकि सरकारी जमीन की सुरक्षा सिर्फ राजस्व विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही का विषय है।
SDM सदर से सीधे सवाल
अब निगाह उप जिलाधिकारी सदर की कार्रवाई पर है।
क्या सातों गाटा नंबरों की संयुक्त जांच कराई जाएगी?
क्या राजस्व टीम मौके पर जाकर सीमांकन करेगी?
क्या खतौनी और मौके की स्थिति का मिलान कराया जाएगा?
क्या संबंधित विभागों से भूमि स्वामित्व की पुष्टि कराई जाएगी?
क्या कथित निर्माणों की वैधता और अनुमति की भी जांच होगी?
और यदि कब्जा प्रमाणित होता है तो क्या जमीन को कब्जामुक्त कराने की कार्रवाई होगी?
यश न्यूज का सवाल—सरकारी जमीन की रखवाली कौन करेगा?
यह मामला किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का है।
शिकायत में जिन गाटा नंबरों का उल्लेख किया गया है, उनकी वास्तविक स्थिति प्रशासनिक जांच से ही सामने आ सकती है।
इसलिए जिला प्रशासन को चाहिए कि मामले को गंभीरता से लेते हुए समयबद्ध, निष्पक्ष और मौके पर जाकर जांच कराए।
अगर शिकायत झूठी है तो शिकायत की सच्चाई भी सामने आए।
अगर आरोप सही हैं तो सरकारी जमीन को कब्जामुक्त कराया जाए और जिम्मेदारी भी तय हो।
क्योंकि सवाल सिर्फ सात गाटा नंबरों का नहीं है—
सवाल यह है कि सरकारी जमीन सुरक्षित है या कागजों में सरकारी और जमीन पर किसी और की?
अब देखना यह है—
SDM सदर की जांच टीम कब मौके पर पहुंचती है?
राजस्व अभिलेख क्या सच बताते हैं?
मौके पर सरकारी जमीन मिलती है या निजी कब्जा?
और अगर आरोप सही निकले तो—
कब्जामुक्ति की कार्रवाई सिर्फ कागजों पर होगी या जमीन पर भी दिखाई देगी?
शेष—प्रशासनिक जांच और मौके की रिपोर्ट के बाद अगले खुलासे मे
