लोकतंत्र और संविधान की मर्यादा तार-तार, समाजसेवी का प्रशासन पर तीखा प्रहार, खून से लिखा जाएगा मांग पत्र
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अयोध्या

आज हिंदू नव वर्ष और चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर अयोध्या प्रशासन का एक दमनकारी चेहरा सामने आया है। सवर्ण समाज की समस्याओं और यूजीसी की विसंगतियों के विरुद्ध आवाज उठा रही समाजसेवी अर्चना तिवारी को उनके आवास पर लगभग 5 घंटों तक ‘हाउस अरेस्ट’ रखा गया। हैरानी की बात यह है कि उन्होंने पूर्व में ही नगर मजिस्ट्रेट को आवेदन देकर महामहिम राष्ट्रपति महोदया को शांतिपूर्ण ज्ञापन सौंपने की अनुमति मांगी थी, जिसकी रिसीविंग भी उनके पास है। खुफिया एजेंसियों और शासन-प्रशासन को पूर्ण जानकारी होने के बावजूद आज एक मातृशक्ति को दूसरी मातृशक्ति से मिलने से रोकने के लिए घंटों पहरा बिठा दिया गया।लोकतंत्र की नियमावली के अनुसार, यदि प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से उन्हें नजरबंद किया था, तो यह उनकी नैतिक जिम्मेदारी थी कि वे किसी सक्षम अधिकारी को भेजकर ज्ञापन स्वीकार करते। लेकिन राष्ट्रपति महोदया के प्रस्थान तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने ज्ञापन लेना उचित नहीं समझा और उनके जाते ही नजरबंदी खत्म कर दी गई। प्रशासन की यह कार्यप्रणाली न केवल सवर्ण समाज की उपेक्षा है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का खुला उपहास भी है। समाजसेवी अर्चना तिवारी ने प्रशासन की संवेदनहीनता पर तीखा प्रहार करते हुए कहा एक तरफ देश के यशस्वी प्रधानमंत्री जी और प्रदेश के मुख्यमंत्री जी कहते हैं कि हमारे लिए जनता ही सर्वोपरि है और जनता ही असली वीआईपी है लेकिन अयोध्या के अधिकारियों का रवैया इसके ठीक उलट है। अधिकारियों का तर्क है कि वीआईपी ड्यूटी के कारण उनके पास समय नहीं है, मानो जनता और सामाजिक कार्यकर्ता उनके लिए कोई महत्व ही नहीं रखते।उन्होंने अधिकारियों के व्यवहार पर सवाल उठाते हुए आगे कहा अब तक मैं केवल सुनती थी कि अधिकारियों के सीयूजी नंबर नहीं उठते लेकिन आज मैंने खुद अपनी आँखों से यह भयावह स्थिति देखी। सुबह से लेकर नजरबंदी खत्म होने तक चाहे खुफिया विभाग हो या प्रशासन के अन्य जिम्मेदार पद कोई भी फोन उठाना उचित नहीं समझ रहा था। यहाँ तक कि विभाग के अपने ही लोग एक-दूसरे से संपर्क करने की कोशिश कर रहे थे, पर उन्हें भी अनसुना किया गया। यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि यदि शहर में कोई बड़ी अनहोनी या हादसा हो जाए, तो जनता किससे संपर्क करेगी क्या तब भी ये सीयूजी नंबर इसी तरह खामोश रहेंगे इस उपेक्षा से आहत अर्चना तिवारी ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र और संविधान के दायरे में रहकर अपनी मांग शासन तक पहुँचाना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। उन्होंने कहा मेरा पांच सूत्रीय मांग पत्र सवर्ण समाज के हितों के लिए था। नियमावली के तहत यदि आप मुलाकात नहीं करवा सकते थे, तो कम से कम राष्ट्रपति महोदया के प्रस्थान के बाद ही ज्ञापन ले लेते और उसे केंद्र सरकार तक प्रेषित करते। लेकिन प्रशासन ने ऐसा करना भी उचित नहीं समझा।प्रशासन की इस कार्यशैली के विरोध में अब अर्चना तिवारी ने अपने खून से मांग पत्र लिखकर शासन को भेजने का निर्णय लिया है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील की है कि वे इन लापरवाह अधिकारियों पर लगाम कसें और संविधान की मर्यादा सुनिश्चित कराएं ताकि जनता का व्यवस्था पर विश्वास बना रहे।
