रोजा सिर्फ भूखा रहना नहीं, चुगलखोरी, जैसी बुराइयों से बचना है :- डॉ.आकिब जावेद
1 min readबांदा

रोजा रखने का मकसद सिर्फ भूखा रहना नहीं होता। अपनी इंद्रियों पर काबू रखना होता है। झूठ, चुगलखोरी जैसी बुराइयों से बचना होता है। हर प्राणी के प्रति सहानुभूति रखना भी जरूरी है। यह बात डॉ.आकिब जावेद ने कही। उन्होंने बताया कि रमजान एक महीने की आध्यात्मिक यात्रा है। इसका समापन ईद-उल-फितर पर एक-दूसरे को गले लगाकर बधाई देने के साथ होता है।
डॉ. आकिब ने कहा कि रमजान का पहला असरा 10 दिन का होता है। इसे रहमत का असरा कहा जाता है। इसे अल्लाह की दया और कृपा का समय माना गया है। इन 10 दिनों में ज्यादातर मुसलमान मस्जिदों और घरों में कुरान की तिलावत ज्यादा करते हैं। अल्लाह को राजी करने के लिए दुआएं करते हैं। इसके बाद 11वें रोजे से 20वें रोजे तक मगफिरत का अशरा होता है। इसे गुनाहों से माफी का समय कहा गया है। इस अशरे में अल्लाह से गुनाहों की माफी मांगने की सलाह दी गई है।
सच्चे दिल से तौबा करने को कहा गया है। इसी समय जरूरतमंदों को दान, जकात, सदका देना भी बहुत शवाब बताया गया है।
अल्लाह के आगे समर्पण का समय होता है अशरा
रमजान का तीसरा और आखिरी अशरा जहन्नुम से निजात का बताया गया है। इसे बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इसमें रातों को जागकर अल्लाह की इबादत की जाती है। इसी दौरान शब-ए-कद्र की रातें आती हैं। इन्हें खास अहमियत दी गई है। अंतिम अशरे में एतकाफ को भी बड़ी इबादत में शामिल बताया गया है। इसमें एक या अधिक लोग शामिल होकर 10 दिनों में दोजख की आग से सुरक्षा की दुआएं करते हैं। दुनियादारी से दूर रहकर अल्लाह की इबादत में लगे रहते हैं। मानवता के लिए दुआएं करते हैं। यह अशय आस्था और अल्लाह के आगे समर्पण का समय होता है। यह गुनाहों से मुक्ति, इबादत में खुद को समर्पित करने की प्रेरणा देता है।
