समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत धौलपुर इकाई की मासिक गोष्ठी हुई संपन्न
1 min readसमरस संस्थान साहित्य सृजन भारत धौलपुर इकाई की
मासिक गोष्ठी हुई संपन्न
वरिष्ठ कवि ओमप्रकाश शर्मा हुए “समरस काव्य अलंकार” से
अलंकृत
समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत की धौलपुर इकाई की मासिक गोष्ठी श्री शिवनारायण शर्मा पूर्व निरीक्षक राजस्व विभाग के मुख्य आतिथ्य में संपन्न हुई, जिसकी अध्यक्षता कवि सुनीत सक्सेना ने की। डॉ. वी. डी. व्यास व डॉ. प्रकाशदीप तिवारी ने विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रह कर कवियों का भरपूर उत्साह वर्धन किया। प्रांतीय अध्यक्ष गोविंद गुरू के सानिध्य में वरिष्ठ कवि ओमप्रकाश शर्मा को ‘समरस काव्य अलंकार’ की उपाधि से विभूषित किया गया। शर्मा ने अनुभूति शीर्षक से राधे-राधे शब्द का व्यापक अर्थ बताते हुए संस्कार और भावनाओं को रेखांकित कर मानव जीवन मूल्यों की कविता पढी़।
कवयित्री श्रीमती पूर्णिमा शर्मा की सरस्वती-वंदना से प्रारम्भ गोष्ठी में उन्होंने राधा और कृष्ण के प्रतीक के माध्यम से भक्ति मय श्रृँगार का गीत राधा संग रास जो रचाये गिरधारी आज, राधा रूप प्यारी पै, बिहारी बलिहारी है। भरपूर आशीर्वाद प्राप्त किया।
गोष्ठी का संचालन कर रहे कवि गोविन्द गुरू ने हास्य व्यंग्य के माध्यम से गुदगुदाते हुए सभी को ऊर्जावान बनाये रखा। इन्होंने सैनिक की अभिलाषा शीर्षक से देश-भक्ति का गीत, अपनी गोद में मुझको सुला लेना ओ भारत माँ, मैं अपनी माँ की बाहों को पसरता छोड़ आया हूँ, मैं जब भी अपने घर जाऊँ तिरंगा ओढ़ कर जाऊँ, बूढ़े बाप की सांसें सिसकता छोड़ आया हूँ। पढ़कर देशभक्ति के भावों को जागृत कर दिया।
डॉ. ध्रुवेन्द्र सिंह ध्रुव ने, राम नाम की महिमा को गाते हुए राम, राम नहीं है मानव,राम प्रेरणा है, भावना है, विश्वास है, रचना के माध्यम से पुरुषोत्तम राम के आदर्शों को मंच पर सुनाकर भरपूर प्यार पाया। राजवीर सिंह क्रांति ने जटायू का क्रोध शीर्षक से जटायु के आदर्श और रावण के दुष्कृत्य को चित्रित किया, उन्होंने जंगल से दाना है,जंगल से पानी है, जंगल से मंगल है, घर-घर रवानी है, गीत पढ़कर जंगल के महत्व को सुनाया। सुमित सक्सेना ने गीत ओ घृणा के तुम पुजारी, नेह इन आँखों में भर लो, पढ़कर प्रेम के प्रभाव को रेखांकित करते हुए भरपूर तालियाँ बटोरीं।
प्रेम प्रसून ने हनुमान जी की वंदना के छन्द पढ़ते हुए रामचंद्र की महिमा का भी वर्णन किया, राम आदि और अंत, राम दीखते दिगंत, राम की कृपा अनंत,राम ही अनंत हैं। कविता के माध्यम से राम जी के आदर्शों को सुनाया। अनसुइया शर्मा ने ग्राम्य जीवन के प्रेम, रीतिरिवाज, वास्तविक प्यार,मनुहार,शुद्ध भोजन, विशुद्ध प्यार,और जन भावनाओं को कुरेद कर गीत पढा़, खूब तालियाँ व दाद पायीं।
प्रिया शुक्ला ने गीत पढ़ते हुए केसरी बलाधिकृत, पिनाक हस्तधारिणी,चण्डिके, बलिष्ठ, पुष्ठ, शत्रु दल विनाशिनी, कविता से वाहवाही बटोरीं।
नंदिनी शर्मा ने महादेव की आराधना का गीत, नमन तुम्हें महादेव देवाधि देव, के माध्यम से आशीर्वाद प्राप्त किया। कुमार गौरव ने,प्यासी होगी बूंद कोई जब, भूखा कोई निवाला होगा, होगी कोई सुभद्रा कल फिर,कल फिर कोई निराला होगा पढा। अंकित शर्मा ईषु प्रिय ने, राम और सीता के प्रतीकों के माध्यम से रामराज्य का दर्शन इस प्रकार प्रस्तुत किया कि महलों वाले राम दिखे हैं, वनगामी सीताएँ देखीं, कितनो ने विरही,व्याकुल,उन दो मन की पीड़ाएँ देखीं। रचना पढ़कर प्यार बटोरा। घनश्याम शर्मा ने वंदना कि, शारदे माँ कृपा कीजिए,ज्ञान का मुझको वर दीजिए। मंच को ऊँचाई दी।
बालकवि रुद्र प्रताप ने मातृभूमि और स्वाभिमान की चर्चा करते हुए शक्ति सिंह की वीरता का वर्णन किया, एक जननी एक धरणी,फिर विभाजन क्यों हुआ, गीत पढ़कर देशभक्ति और कर्तव्य से परिचय कराया।
डॉ. वी. डी. व्यास व डॉ. तिवारी ने पंच परिवर्तन की विषय वार व्याख्या करते हुए समय की माँग के साथ-साथ स्वयं को परिवर्तित कर समाज में समरसता स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इकाई की प्रकाशाधीन पुस्तक “समरस काव्य सरिता” के प्रकाशन एवं विमोचन की व्यवस्था पर विचार विमर्श करने के बाद नंदिनी शर्मा ने सभी धन्यवाद व आभार प्रकट किया।

