वर्दी मानवता का प्रतीक,सेवा ही सच्चा धर्म :- बलवंत चौधरी
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अयोध्या की चौदह कोसी परिक्रमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह उस सनातन परंपरा का जीवंत रूप है जिसमें भक्ति, सेवा और संवेदना एक साथ प्रवाहित होती हैं। इस वर्ष परिक्रमा के पावन अवसर पर जब श्रद्धालुओं की भीड़ में एक वृद्धा थकान और भीड़ के कारण आगे बढ़ने में असमर्थ हो गईं तब पुलिस के वर्दीधारी अधिकारी ने जो किया, उसने अयोध्या की आत्मा को पुनः जीवित कर दिया।

एसपी ग्रामीण बलवंत कुमार चौधरी का वह क्षण —जब उन्होंने स्वयं व्हीलचेयर थामकर उस माँ को मार्ग पार कराया —सिर्फ एक प्रशासनिक कर्तव्य नहीं था; वह एक आध्यात्मिक कर्म था। उस पल में वर्दी मानवता का प्रतीक बन गई, और सेवा धर्म का स्वरूप।
यह दृश्य उन सभी श्रद्धालुओं की आँखों में श्रद्धा का दीप बनकर जल उठा। भीड़ में उपस्थित जनसागर ने देखा कि भक्ति केवल आरती और पुष्पों से नहीं, बल्कि करुणा और कर्म से भी प्रकट होती है। चौधरी की यह पहल हमें यह स्मरण कराती है कि धर्म का सार किसी उपदेश में नहीं, बल्कि सेवा के उस छोटे से कर्म में छिपा होता है जो दूसरों के कष्ट को हल्का कर दे।
अयोध्या की परिक्रमा मार्ग पर जब भजन की धुनें, जयकारों की गूँज और भक्तों की थकान मिलती है, तभी तो यह भूमि पुनः रामत्व का बोध कराती है। ऐसे में यदि कोई अधिकारी श्रद्धालु को माँ समझकर उसका भार अपने कंधों पर उठा ले, तो यह दृश्य प्रशासनिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक हो जाता है।
पुलिस का चेहरा अक्सर सख़्ती और अनुशासन का पर्याय माना जाता है परंतु अयोध्या में पुलिस ने जिस सेवा भाव का परिचय दिया, उसने उसे “जनसेवक” के सही अर्थ में स्थापित कर दिया। यही वह भाव है जो रामराज्य के मूल में था— जहाँ शासक और सेवक दोनों का एक ही धर्म था: जनकल्याण।
यह घटना केवल एक प्रशंसनीय क्षण नहीं बल्कि हमारे समाज के लिए एक सीख है— कि व्यवस्था तभी धर्ममय होती है जब उसमें संवेदना जीवित रहती है।
अयोध्या की परिक्रमा में उस व्हीलचेयर पर बैठी वृद्धा, और उसे आगे बढ़ाते हुए पुलिस अधिकारी—दोनों ही हमें यह सिखा गए कि सेवा ही सच्चा साधना मार्ग है, और करुणा ही सच्चा धर्म।
