बड़े हर्षोल्लास पूर्वक मनाई गई भगवान परशुराम की जन्मजयंती
1 min readसुल्तानपुर

धरती पर जब भी अधर्म बलवान होता है, तब-तब धर्म की पुनर्स्थापना हेतु भगवान स्वयं विविध रूपों में अवतरित होते हैं। ऐसे ही एक दिव्य अवतार हैं भगवान परशुराम, जिनका प्राकट्य वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ। यह दिन परशुराम जयंती के रूप में संपूर्ण भारतवर्ष में श्रद्धा, भक्ति और आत्मगौरव के साथ मनाया जाता है।
भगवान परशुराम न केवल विष्णु के छठे अवतार हैं, अपितु वे शक्ति, साहस, ब्रह्मतेज और तपस्याशक्ति के अद्वितीय संगम हैं। वे ब्राह्मणत्व के आत्मसंयम और क्षात्रधर्म के संकल्प का समन्वय हैं | भगवान परशुराम, एक ऐसी समर्थ सत्ता हैं , जिन्होंने अधर्माचारिणी सत्ता को बार-बार परास्त कर धर्म की प्रतिष्ठा की।
उनका जीवन कोई साधारण आख्यान नहीं, अपितु एक अनवरत तप और त्याग की महागाथा है। उन्होंने शस्त्र और शास्त्र — दोनों को साधा। एक ओर जहाँ वे भगवान शिव से दिव्य परशु प्राप्त कर विजयी योद्धा बने, वहीं दूसरी ओर वे ब्रह्मऋषि भृगु के वंशज होकर ब्रह्मतेज की साक्षात मूर्ति बने। उनका क्रोध केवल विध्वंसक नहीं था, अपितु वह करुणा संपन्न धर्म संरक्षण की पवित्र ज्वाला थी, जिसमें अधर्म की आहुति दी गई।
परशुराम जी का संदेश कालजयी है; जब-जब समाज अन्याय, अनाचार और अहंकार की ओर झुकेगा, तब-तब एक परशुराम की आवश्यकता पड़ेगी; चाहे वह बाह्य हो या अंतरात्मा का। भगवान परशुराम केवल एक पौराणिक अथवा ऐतिहासिक चरित्र नहीं, अपितु एक चेतना, एक प्रेरणा, और एक धर्मशील प्रतिज्ञा हैं।
आज परशुराम जयंती के पावन पर्व पर, हम उनके तेज, तप और तत्त्व से प्रेरणा लेकर यह संकल्प लें कि हम भी अपने जीवन में अन्याय के विरुद्ध खड़े होंगे, संयम, शौर्य और श्रद्धा के पथ पर अग्रसर होंगे।भगवान
परशुराम जी का अनुग्रह सम्पूर्ण जैव जगत पर बना रहे, यही मंगलकामना है।
