पंचायत चुनाव पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला , ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने के सरकारी आदेश पर लगाई रोक
1 min readउत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टालने के सरकारी फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि जिन प्रावधानों के आधार पर आदेश जारी किए गए, उन्हें पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है। राज्य सरकार से चुनाव कराने की समयसीमा बताने वाला हलफनामा मांगा गया है, अन्यथा संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा। यह फैसला न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टालने के मामले में राज्य सरकार के रवैये पर गंभीर टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने कहा कि 25 और 26 मई 2026 के जिन आदेशों के आधार पर ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने का प्रयास किया गया, वे प्रथम दृष्टया ऐसे प्रावधानों पर आधारित हैं जिन्हें पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है।
कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 24 एई और 243 के के अनुसार पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता और समय पर चुनाव कराना अनिवार्य है। अदालत ने राज्य सरकार को अंतिम अवसर देते हुए ओबीसी आयोग की रिपोर्ट और पंचायत चुनाव कराने की स्पष्ट समयसीमा हलफनामे के साथ पेश करने का निर्देश दिया है।
सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग ने अदालत को बताया कि 10 जून 2026 को मतदाता सूची प्रकाशित की जा चुकी है और आयोग चुनाव कराने के लिए तैयार है। केवल राज्य सरकार की ओर से आवश्यक व्यवस्थाएं उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण चुनाव प्रक्रिया रुकी हुई है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अगली सुनवाई तक सरकार संतोषजनक जवाब नहीं देती तो संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि असंवैधानिक प्रावधानों के आधार पर जारी आदेशों के रहते प्रधानों को प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को होगी।

