श्रीमद् भागवत कथा में उमड़ा आस्था का सैलाब, श्रद्धालुओं ने किया भक्ति रस का आनंद
1 min read अंबेडकरनगर
जनपद के ग्राम पंचायत पहूंती अंतर्गत ग्राम पिछवारा में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा में श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत वातावरण देखने को मिल रहा है। कथा के छठे दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर भगवान की महिमा का श्रवण कर पुण्य लाभ प्राप्त किया। कार्यक्रम के मुख्य यजमान अभिमन्यु पाठक एवं श्रीमती चिंता पाठक के सानिध्य में चल रही कथा में क्षेत्रीय भक्तों का उत्साह लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है।
कथा व्यास पंडित नागेंद्र जी महाराज ने अपने मुखारविंद से श्रीमद् भागवत की अमृतमयी वाणी का रसपान कराते हुए भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, भक्तों के प्रति उनकी करुणा तथा धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा से जुड़े प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया।
श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के छठे दिन (षष्ठ स्कंध) मुख्य रूप से अजामिल की कथा, वृत्रासुर वध और चित्रकेतु महाराज के प्रसंग के माध्यम से प्रभु की महिमा और भगवद् भक्ति की शक्ति का वर्णन किया गया है।

- अजामिल का उद्धार:छठे दिवस की कथा की शुरुआत अजामिल के प्रसंग से होती है। अजामिल एक ब्राह्मण थे, जो कुसंगति में पड़कर अपने धर्म से भटक गए थे। अपने जीवन के अंतिम समय में, जब यमदूत उन्हें लेने आए, तो भयभीत होकर उन्होंने अपने सबसे छोटे बेटे ‘नारायण’ को पुकारा। अनजाने में ही सही, लेकिन भगवान का नाम लेने मात्र से भगवान विष्णु के पार्षद (विष्णुदूत) वहाँ प्रकट हो गए और उन्होंने यमदूतों को रोक दिया। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि प्रभु का नाम किसी भी अवस्था में लेने से जीव का उद्धार हो जाता है।
- प्रह्लाद चरित्र:इसके पश्चात असुर राज हिरण्यकशिपु के पुत्र भक्त प्रह्लाद की कथा आती है। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनके पिता ने उन्हें बहुत प्रताड़ित किया, जहर दिया, हाथियों के पैरों तले कुचलवाया और पहाड़ से गिरवाया, लेकिन प्रह्लाद की अटूट भक्ति के कारण हर बार भगवान ने उनकी रक्षा की।
- भगवान नृसिंह अवतार:भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने खंभे को फाड़कर आधा मनुष्य और आधा सिंह (नृसिंह) का अवतार लिया। उन्होंने गोधूलि बेला में अपनी उँगलियों से हिरण्यकशिपु का वध कर दिया, जो भगवान की कृपा का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है।
- वृत्रासुर की कथा:छठे दिन देवराज इंद्र और वृत्रासुर के युद्ध की मार्मिक कथा भी सुनाई जाती है। वृत्रासुर एक महान भक्त थे। युद्ध के दौरान भी उनका मन ईश्वर की भक्ति में लीन था। उन्होंने अपने प्राण स्वेच्छा से त्याग दिए, जिससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर की शरण में जाने के बाद मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
- चित्रकेतु का प्रसंग:राजा चित्रकेतु की कथा के माध्यम से मोह और माया के जाल को समझाया जाता है। जब राजा के पुत्र की मृत्यु हो जाती है, तब माता पार्वती और भगवान शिव उन्हें सांत्वना देते हैं। यह कथा हमें सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर ज्ञान मार्ग अपनाने की प्रेरणा देती है।
कथा के दौरान श्रद्धालु भक्ति भाव में डूबे नजर आए और पूरा पंडाल “राधे-राधे” व “जय श्रीकृष्ण” के जयघोष से गूंज उठा।
आयोजन स्थल को आकर्षक ढंग से सजाया गया है, जहां भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों से वातावरण भक्तिमय बना हुआ है। महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं सहित बच्चों की भी बड़ी भागीदारी देखने को मिली। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।
ग्रामीणों ने बताया कि इस प्रकार के धार्मिक आयोजनों से समाज में आध्यात्मिक चेतना और आपसी सद्भाव को बढ़ावा मिलता है।
