मौसम की मार से धान की फसल चौपट
1 min readकिसान परेशान, बांदा जनपद बेहाल,मुआवजे और सर्वे का इंतजार कर रहे अन्नदाता- कामरेड आक्सीजन बाबा रामकृष्ण अवस्थी

मौसम की मार से धान की फसल चौपट, खेतों में बर्बादी का मंजर; मुआवजे और सर्वे का इंतजार कर रहे अन्नदाता- कामरेड आक्सीजन बाबा रामकृष्ण अवस्थी
बांदा। बुंदेलखंड का किसान एक बार फिर मौसम की मार से कराह रहा है। पहले बेमौसम बारिश ने धान की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया और अब खेतों में खड़ी तथा कटी पड़ी फसल किसानों की चिंता बढ़ा रही है। कहीं धान की फसल खेतों में कटकर पड़ी है तो कहीं खड़ी फसल में धान का दाना कमजोर और कम विकसित होने से उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।
प्राकृतिक आपदा की दोहरी मार झेल रहा किसान आखिर अपनी पीड़ा किससे कहे? एक तरफ खेती में लगाई गई पूंजी डूबने का खतरा है, दूसरी तरफ अगली फसल की तैयारी सिर पर है। किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मौजूदा फसल ही बर्बाद हो रही है तो केसीसी (किसान क्रेडिट कार्ड) का कर्ज कैसे चुकाया जाएगा और अगली फसल की बुवाई के लिए खाद, बीज, डीजल तथा जुताई का खर्च कहां से आएगा?
सर्वे का इंतजार, राहत का कोई ठोस पता नहीं
किसानों की पीड़ा यह है कि फसल नुकसान के आकलन के लिए सर्वे की प्रक्रिया का अब तक उन्हें कोई स्पष्ट पता नहीं चल पा रहा है। खेतों में नुकसान सामने है, लेकिन प्रभावित किसानों को मुआवजे और सरकारी राहत को लेकर इंतजार करना पड़ रहा है।
किसानों का सवाल है कि क्या प्रशासन और संबंधित विभाग खेतों में पहुंचकर वास्तविक नुकसान का आकलन करेंगे या अन्नदाता अपनी बर्बादी का हिसाब खुद ही लगाता रहेगा?
कर्ज के बोझ और अगली फसल की चिंता में किसान
धान की फसल किसानों के लिए सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि पूरे साल की आर्थिक व्यवस्था का आधार होती है। फसल खराब होने से परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, खेती का कर्ज और अगली फसल की तैयारी सब प्रभावित हो रहे हैं। केसीसी का भुगतान करना है, लेकिन आमदनी का जरिया ही संकट में है।
प्रशासन और सरकार से किसानों की प्रमुख मांगें
- बांदा जनपद के सभी प्रभावित गांवों में तत्काल निष्पक्ष स्थलीय सर्वे कराया जाए।
- खेतों में कटी पड़ी और खड़ी धान की फसल के नुकसान का वास्तविक आकलन हो।
- पात्र प्रभावित किसानों को शीघ्र उचित फसल मुआवजा एवं बीमा क्लेम दिलाया जाए।
- केसीसी ऋण की वसूली में नियमानुसार राहत और आवश्यकतानुसार ऋण पुनर्गठन की व्यवस्था की जाए।
- अगली फसल की बुवाई के लिए किसानों को आर्थिक सहायता, खाद और बीज उपलब्ध कराया जाए।
आखिर कब जागेगा जिम्मेदार तंत्र?
किसान देश का अन्नदाता है, लेकिन जब उसकी अपनी मेहनत की कमाई खेतों में बर्बाद हो रही हो, तब उसे सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। जरूरत है कि अधिकारी कागजी आंकड़ों के बजाय खेतों में पहुंचकर वास्तविक स्थिति देखें और प्रभावित किसानों को समय रहते राहत पहुंचाएं।
आज बांदा के किसान का सवाल सीधा है—जब फसल ही नहीं बचेगी तो कर्ज कैसे चुकाएंगे और अगली फसल कैसे उगाएंगे?
अन्नदाता को आश्वासन नहीं, समय पर सर्वे, उचित मुआवजा चाहिए।
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