रामलीला मैदान दशहरा हंगामा, पुलिस कार्यशैली पर गंभीर आरोप, आयोजक और दूसरे पक्ष को क्लीन चिट, निष्पक्ष विवेचना की मांग
1 min readकर्नलगंज रामलीला मैदान दशहरा हंगामा: पुलिस की एफआईआर पर पक्षपात के गंभीर आरोप, आयोजक और दूसरे पक्ष को क्लीन चिट क्यों? निष्पक्ष विवेचना की मांग
मंच पर चढ़ने के विवाद में एकपक्षीय एफआईआर, विधिक प्रक्रिया और आयोजक की जिम्मेदारी पर उठे सवाल – प्रभावशाली के दबाव में कार्रवाई का आरोप
गोण्डा।

कोतवाली कर्नलगंज क्षेत्र के रामलीला मैदान में 20 अक्टूबर 2026 को दशहरा मेले के दौरान मंच पर चढ़ने को लेकर हुए हंगामे में दर्ज एफआईआर की वैधानिकता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए मेले के मुख्य आयोजक और विवाद के दूसरे पक्ष को पूरी तरह बाहर रखा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार 20 अक्टूबर को रामलीला मैदान में कार्यक्रम के दौरान विवाद हुआ। इस संबंध में 21 अक्टूबर को कस्बा चौकी इंचार्ज की तहरीर पर कोतवाली कर्नलगंज में दिवंगत विधायक कुंवर अजय प्रताप सिंह उर्फ लल्ला भैया के सुपुत्र कुंवर शारदेन मोहन सिंह के 40-50 अज्ञात समर्थकों के विरुद्ध विभिन्न धाराओं में अभियोग पंजीकृत किया गया। वैधानिक रूप से एफआईआर पर कई बड़े गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
आयोजक की वैधानिक जिम्मेदारी से किनारा क्यों?
विधि के अनुसार किसी भी सार्वजनिक मेले/रामलीला/दशहरा आयोजन के लिए अनुमति लेना, मंच की सुरक्षा, भीड़ नियंत्रण,और कानून-व्यवस्था बनाए रखना मुख्य आयोजक का वैधानिक दायित्व होता है। किसी भी अप्रिय घटना पर आयोजक की भूमिका की जांच प्रथम दृष्टया आवश्यक है। ऐसे में एफआईआर में आयोजक का नाम तक न होना विधिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है।
दो पक्षों के विवाद में एक पक्षीय अभियोग क्यों?
कथित तौर पर विवाद मंच पर चढ़ने को लेकर दो पक्षों के बीच हुआ था। भारतीय न्याय संहिता के तहत यदि घटना में दो पक्ष शामिल हैं तो दोनों पक्षों के कृत्य की विवेचना होना न्यायसंगत है। फिर केवल एक पक्ष को अभियुक्त बनाना और दूसरे पक्ष को जांच से बाहर रखना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत माना जा रहा है।
मौके पर त्वरित कार्रवाई का अभाव –
यदि मौके पर हंगामा हुआ और वहां भारी फोर्स मौजूद रही तो पुलिस द्वारा मौके पर ही निरोधात्मक कार्रवाई कर आरोपियों को हिरासत में क्यों नहीं लिया गया? 24 घंटे बाद एफआईआर दर्ज होना यह प्रश्न उत्पन्न करता है कि क्या यह त्वरित विधिक कार्रवाई थी या किसी के परामर्श / दबाव के बाद की गई कार्रवाई?
आयोजक को क्लीन चिट कैसे?
स्थानीय लोगों का कहना है कि बिना आयोजक से पूछताछ और उसकी अनुमति/व्यवस्था की जांच के, उसे क्लीन चिट देना विवेचना को प्रभावित कर सकता है।
प्रभावशाली के दबाव की चर्चा
क्षेत्र में चर्चा है कि यह एफआईआर किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में साजिशन एकतरफा दर्ज की गई है ताकि वास्तविक जिम्मेदारों को बचाया जा सके। यह आरोप जांच का विषय है।
कानूनी मांग – विवेचना में नाम शामिल हों
स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और अधिवक्ताओं का कहना है कि निष्पक्ष विवेचना के लिए बीएनएसएस की धारा 173 के तहत दर्ज इस एफआईआर में रामलीला दशहरा मेले के मुख्य आयोजक/अनुमति धारक और विवाद के दूसरे पक्ष की भूमिका की जांच कर उनके नाम विवेचना में शामिल किए जाएं। उन्होंने पुलिस अधीक्षक, गोंडा से मांग की है कि पूरे प्रकरण का संज्ञान लेकर क्षेत्राधिकारी स्तर से निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि आयोजक की लापरवाही या दूसरे पक्ष की संलिप्तता पाई जाए तो विधि सम्मत कार्रवाई की जाए।
आस्था के मेले में बाउंसरों का क्या काम? रामलीला-दशहरा मेला में निजी सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल
किससे परमिशन लेकर उतारे गए बाउंसर? आयोजकों की मंशा पर सवाल, प्रशासन की चुप्पी से बढ़ा संदेह
श्रीराम लीला और विजयदशमी के पावन मेले में आखिर बाउंसरों की क्या जरूरत पड़ गई? कर्नलगंज के ऐतिहासिक रामलीला दशहरा मेले में आयोजकों द्वारा निजी बाउंसर तैनात किए जाने ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। आस्था, संस्कृति और परंपरा से जुड़े इस मेले में बाउंसर कल्चर लाने पर लोगों में भारी आक्रोश है और कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। बाउंसर की जरूरत क्यों पड़ी? क्या रामलीला मेला कोई नाइट क्लब या प्राइवेट पार्टी है जो बाउंसरों की जरूरत पड़ गई? क्या स्थानीय पुलिस और प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था पर आयोजकों को भरोसा नहीं था? किससे ली परमिशन? मेले में निजी बाउंसर रखने के लिए आयोजकों ने किस सक्षम अधिकारी से अनुमति ली? क्या एसडीएम, सीओ या कोतवाली से इसकी लिखित परमिशन ली गई है? अगर नहीं, तो यह खुलेआम नियमों का उल्लंघन है। बाउंसरों का सत्यापन हुआ या नहीं? मेले में तैनात बाउंसरों का पुलिस सत्यापन हुआ है या नहीं? उनके पास कोई आईडी, लाइसेंस है या ऐसे ही असामाजिक तत्वों को वर्दी पहनाकर खड़ा कर दिया गया? क्या श्रद्धालुओं को डराने-धमकाने के लिए? आरोप है कि बाउंसरों ने कई दुकानदारों और आम श्रद्धालुओं के साथ अभद्रता की। क्या आस्था के मेले को डर और दबंगई से कंट्रोल करने की कोशिश हो रही है। प्रशासन मौन क्यों? इतनी बड़ी चूक के बाद भी प्रशासन चुप क्यों है? क्या आयोजकों को किसी बड़े नेता या अधिकारी का संरक्षण प्राप्त है?
स्थानीय लोगों और जागरूक नागरिकों ने जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक गोंडा से मांग की है कि पूरे मामले की जांच कराई जाए कि आखिर किसके आदेश पर और किसकी परमिशन से रामलीला जैसे धार्मिक मेले में बाउंसर उतारे गए? अगर बिना परमिशन के बाउंसर लगाए गए हैं तो आयोजकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
यदि निष्पक्ष जांच नहीं हुई और आयोजक व दूसरे पक्ष की भूमिका की जांच किए बिना ही विवेचना आगे बढ़ी, तो यह धारणा बलवती होगी कि कर्नलगंज में कानून का पैमाना अलग-अलग है। पुलिस प्रशासन को चाहिए कि वह सभी पहलुओं की जांच कर जनता के मन में उठ रहे सवालों का निराकरण करे।
